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लेबर कार्ड कैसे बनवाएँ — निर्माण मज़दूरों के लिए

अगर आप निर्माण के काम में लगे हैं — राजमिस्त्री, बेलदार, हेल्पर, बढ़ई, सरिया, सेंट्रिंग, पेंटर, प्लंबर, कुछ भी — तो सरकार का एक कार्ड आपके नाम पर बन सकता है। लोग इसे लेबर कार्ड कहते हैं। असल में यह आपके राज्य के भवन एवं अन्य निर्माण कामगार कल्याण मंडल का रजिस्ट्रेशन है। इसी कार्ड से पेंशन, इलाज, दुर्घटना, शादी और बच्चों की पढ़ाई की मदद मिलती है। और यह बात ज़रूर जान लीजिए: कानून पक्की नौकरी नहीं माँगता, सिर्फ़ यह माँगता है कि पिछले बारह महीनों में आपने कम से कम 90 दिन निर्माण का काम किया हो। यानी नाके पर या लेबर चौक पर खड़े होकर रोज़ का काम पकड़ने वाला भी इसमें आता है। एक बात सबसे पहले समझ लीजिए: कार्ड पूरे देश का एक नहीं होता। हर राज्य का अपना मंडल है, अपना पोर्टल है और अपनी रकम है।

अपडेट:

लेबर कार्ड होता क्या है

हर निर्माण की साइट पर लागत के हिसाब से एक सेस वसूला जाता है। वह पैसा बिल्डर या मालिक देता है और राज्य के कल्याण मंडल के पास जमा होता है। उसी पैसे से मज़दूरों की योजनाएँ चलती हैं।

लेबर कार्ड आपका सबूत है कि आप निर्माण मज़दूर हैं। कार्ड नहीं है तो वह पैसा आपके काम नहीं आता, चाहे आप बीस साल से साइट पर काम कर रहे हों।

यह मंडल कोई एक दफ़्तर नहीं है। कानून हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश से अपना मंडल बनवाता है। दिल्ली का अपना, यूपी का अपना, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, झारखंड, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ — सबका अपना-अपना।

कार्ड उसी राज्य का बनता है जहाँ आप काम करते हैं

यह सबसे बड़ी गलतफ़हमी है और इसी में सबसे ज़्यादा वक़्त बरबाद होता है।

नियम सीधा है: कार्ड इस पर बनता है कि आप कहाँ निर्माण का काम कर रहे हैं, इस पर नहीं कि आपका गाँव कहाँ है। गोरखपुर के रहने वाले हैं और दिल्ली की साइट पर काम कर रहे हैं, तो अर्ज़ी दिल्ली के मंडल में जाएगी। पटना के हैं और जयपुर में काम कर रहे हैं, तो राजस्थान के मंडल में।

इसकी वजह भी वही सेस है। जिस राज्य में इमारत बन रही है, सेस उसी राज्य के मंडल में जमा हुआ है। इसलिए योजना का पैसा भी उसी राज्य से निकलता है।

हाँ, गाँव लौटकर छह महीने वहीं काम करते हैं और फिर शहर आते हैं — यह बहुत आम है। ऐसे में दोनों जगह के नियम अलग हो सकते हैं। नीचे "दूसरे राज्य चले जाएँ तो" वाला हिस्सा पढ़िए।

कौन बनवा सकता है — तीन शर्तें

एक — उम्र 18 साल पूरी हो चुकी हो और 60 साल पूरी न हुई हो।

दो — पिछले बारह महीनों में आपने कम से कम 90 दिन निर्माण का काम किया हो।

तीन — काम निर्माण का हो। राजमिस्त्री, हेल्पर, बेलदार, बढ़ई, सरिया मिस्त्री, पेंटर, प्लंबर, बिजली मिस्त्री, टाइल मिस्त्री, शटरिंग, वेल्डर, जेसीबी चालक, सड़क और पुल का काम — सब आते हैं।

ये तीनों शर्तें केंद्र के कानून से आती हैं, इसलिए हर राज्य में एक जैसी हैं। बाकी सब — फ़ीस, कागज़ों की सूची, रिन्यू का तरीका, कौन सी योजना में कितना पैसा — राज्य के अपने नियमों से तय होता है और अलग-अलग है।

ठेकेदार के नीचे काम करते हों या रोज़ लेबर चौक से काम पकड़ते हों, दोनों हालत में कार्ड बनता है। पक्की नौकरी होना ज़रूरी नहीं।

90 दिन वाली शर्त सिर्फ़ शुरू में नहीं, आगे भी लागू रहती है। साल भर में 90 दिन का निर्माण काम न हो, या 60 साल की उम्र पूरी हो जाए, तो कार्ड आगे नहीं चलता।

कौन-कौन से कागज़ लगेंगे

सूची राज्य के हिसाब से थोड़ी बदलती है, पर ढाँचा हर जगह यही रहता है। साथ रखिए — आधार कार्ड, उम्र का सबूत, आधार से जुड़ा चालू मोबाइल नंबर, पासपोर्ट साइज़ फ़ोटो, अपने ही नाम की बैंक पासबुक (IFSC समेत), और नामिनी की जानकारी।

पैसा सीधे बैंक खाते में आता है, इसलिए खाता आपके ही नाम का होना चाहिए। ठेकेदार, भाई या दोस्त के खाते पर दावा अटक जाता है।

असली अड़चन एक ही कागज़ है — 90 दिन के काम का रोज़गार प्रमाणपत्र। यही सबसे ज़्यादा लोगों को रोकता है, क्योंकि ठेकेदार दस्तख़त करने से बचता है।

यहाँ जानने लायक बात यह है कि कई राज्यों में दस्तख़त का रास्ता एक नहीं होता। मिसाल के तौर पर कर्नाटक में यह प्रमाणपत्र चार अलग फ़ॉर्म में बनता है — फ़ॉर्म V(A) पर मालिक या ठेकेदार, V(B) पर रजिस्टर्ड मज़दूर यूनियन, V(C) पर श्रम निरीक्षक और V(D) पर ग्राम पंचायत। यानी ठेकेदार मना कर दे तो भी तीन रास्ते बाकी बचते हैं।

हर राज्य में ठीक यही चार फ़ॉर्म हों, यह ज़रूरी नहीं। पर सवाल पूछने लायक ज़रूर है: अपने मंडल के दफ़्तर या हेल्पलाइन पर पूछिए कि "ठेकेदार के अलावा और कौन प्रमाणपत्र पर दस्तख़त कर सकता है"। कई मज़दूर सिर्फ़ इसलिए कार्ड नहीं बनवा पाते क्योंकि उन्हें यह सवाल पूछना ही नहीं बताया गया।

कुछ राज्यों में स्व-घोषणा (self-declaration) से भी काम चल जाता है और कुछ में साइट पर लगे मस्टर रोल की नकल चलती है। अपने राज्य के पन्ने पर लिखी सूची ही आख़िरी बात है।

फ़ीस कितनी है — और किसे पैसे नहीं देने हैं

ज़्यादातर राज्यों में रजिस्ट्रेशन या तो मुफ़्त है या नाम भर का पैसा लगता है, और उसके ऊपर सालाना अंशदान की एक छोटी रकम होती है। असली रकम राज्य के अपने नियम में लिखी होती है — इसलिए यहाँ हम कोई एक नंबर नहीं दे रहे, अपने राज्य के पन्ने पर देख लीजिए।

मिसाल: कर्नाटक के मंडल और Seva Sindhu, दोनों पर साफ़ लिखा है कि अर्ज़ी की फ़ीस शून्य रुपये है और ऑनलाइन जमा करने पर सेवा शुल्क भी शून्य।

चाहे जो भी रकम हो, एक बात हर राज्य में एक जैसी है: वह रकम सरकार के काउंटर पर या पोर्टल पर जाती है, किसी बिचौलिये की जेब में नहीं। साइट के बाहर बैठा एजेंट अगर हज़ार-दो हज़ार माँगे तो वह सरकारी फ़ीस नहीं, उसकी अपनी वसूली है।

जो भी दें, रसीद लीजिए। रसीद न मिले तो समझ जाइए कि पैसा सरकार तक नहीं जा रहा।

अपना आधार, बैंक पासबुक या OTP किसी एजेंट को मत दीजिए। कोई भी सरकारी दफ़्तर OTP नहीं माँगता। OTP माँगने वाला हर आदमी ठग है, चाहे वह ख़ुद को कुछ भी बताए।

अपने राज्य के मंडल तक कैसे पहुँचें

हर राज्य के मंडल का अपना पोर्टल है और नाम अलग-अलग हैं, इसलिए ढूँढ़ने का तरीका सीख लेना सबसे काम का है।

पहला रास्ता — अपने राज्य के श्रम विभाग की वेबसाइट खोलिए और उसमें "भवन एवं अन्य निर्माण कामगार कल्याण मंडल" या "Building and Other Construction Workers Welfare Board" ढूँढ़िए। रजिस्ट्रेशन का लिंक वहीं मिलेगा।

दूसरा रास्ता — कई राज्यों में सारी सरकारी सेवाएँ एक ही खिड़की से चलती हैं। राजस्थान में SSO, हरियाणा में सरल, बिहार और यूपी में राज्य का सेवा पोर्टल। वहाँ लॉगिन बनाकर उसी में से निर्माण मज़दूर रजिस्ट्रेशन चुना जा सकता है।

तीसरा और सबसे भरोसेमंद रास्ता — अपने ज़िले के श्रम कार्यालय या श्रम निरीक्षक के दफ़्तर जाइए, या अपने राज्य के श्रम विभाग की हेल्पलाइन पर फ़ोन कीजिए। पूछना मुफ़्त है और वहीं से सही फ़ॉर्म मिल जाता है।

वेब पते पर एक चीज़ ज़रूर देखिए — पते के आख़िर में .gov.in या .nic.in हो। .com और .in वाले बहुत से पन्ने असली सरकारी पन्नों की नकल हैं और वहाँ आपसे फ़ीस माँगी जाएगी।

नीचे अपने राज्य का पन्ना खुला हो तो वहाँ उसी राज्य का पोर्टल, फ़ीस, कागज़ और हेल्पलाइन एक जगह लिखे मिलेंगे।

कार्ड से क्या-क्या मिलता है

योजनाओं की क़िस्में लगभग हर राज्य में एक जैसी हैं, पर रकम हर राज्य में अलग है — और यही वह जगह है जहाँ इंटरनेट पर सबसे ज़्यादा गलत नंबर घूमते हैं। हम यहाँ सिर्फ़ बताएँगे कि किन-किन चीज़ों की मदद मिलती है; रकम अपने राज्य के पन्ने या हेल्पलाइन से पक्की कीजिए।

पेंशन: तय उम्र के बाद हर महीने पेंशन। इसके लिए आम तौर पर कई साल पहले से रजिस्टर्ड होना ज़रूरी होता है — इसलिए कार्ड जल्दी बनवाने का फ़ायदा है।

दुर्घटना और मौत: काम की जगह पर दुर्घटना से मौत होने पर नामिनी को एकमुश्त रकम, और अपंगता पर अलग रकम। यह सबसे बड़ी रकम होती है और सबसे कम दावा इसी का किया जाता है।

इलाज: अस्पताल में भर्ती होने पर मदद, और बड़ी बीमारियों के लिए अलग रकम।

प्रसूति और शादी: पहले दो बच्चों के जन्म पर मदद, और अपनी या आश्रित बेटी-बेटे की शादी पर मदद।

बच्चों की पढ़ाई: कक्षा के हिसाब से हर साल छात्रवृत्ति, और आगे की पढ़ाई के लिए ज़्यादा रकम।

औज़ार, साइकिल, घर बनाने का कर्ज़ या मदद, और अंतिम संस्कार की रकम — ये भी ज़्यादातर राज्यों में हैं।

एक बात याद रखिए: पैसा अपने आप नहीं आता। हर योजना का अपना फ़ॉर्म है और अकसर दावा करने की मियाद भी है — मिसाल के तौर पर दुर्घटना का दावा कई राज्यों में एक साल के अंदर देना होता है। कुछ भी हो जाए तो पहले हफ़्ते में ही मंडल के दफ़्तर पूछ लीजिए।

कार्ड को चालू रखना — यहीं सबसे ज़्यादा लोग चूकते हैं

कार्ड बनवाना आधा काम है। लगभग हर राज्य में कार्ड की एक मियाद होती है और उसे समय-समय पर रिन्यू कराना पड़ता है।

रिन्यू न कराया तो खाता बंद हो जाता है। और बंद कार्ड पर किसी योजना का दावा नहीं होता — वह वक़्त अकसर वही होता है जब पैसे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, जैसे इलाज के समय या बच्चे की फ़ीस के समय।

रिन्यू की खिड़की और सालाना अंशदान का नियम हर राज्य का अलग है। मिसाल के तौर पर कर्नाटक में ई-कार्ड एक साल चलता है और रिन्यू मियाद ख़त्म होने से 15 दिन पहले से लेकर एक साल बाद तक कराया जा सकता है।

फ़ोन में एक याद-दिलावा (reminder) लगा लीजिए — कार्ड की मियाद ख़त्म होने से एक महीना पहले का। यह छोटी सी आदत हज़ारों रुपये बचा देती है।

रिन्यू के लिए आम तौर पर वही काम का प्रमाणपत्र दोबारा लगता है। यानी हर साल 90 दिन के काम का सबूत रखना पड़ता है — इसीलिए हाज़िरी फ़ोन में लिखने की आदत डालिए।

दूसरे राज्य चले जाएँ तो

यह सवाल हर प्रवासी मज़दूर का है और इसका जवाब सीधा नहीं है, इसलिए ध्यान से पढ़िए।

आपका कार्ड उसी मंडल का है जिसमें आपने नाम लिखाया। दूसरे राज्य चले गए तो वह कार्ड अपने आप वहाँ नहीं चलता। नए राज्य में लंबे समय तक रुकना है तो वहाँ के मंडल में अलग रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है।

पुराने कार्ड को बंद मत कीजिए। जब तक उसकी मियाद चालू है और आपने अंशदान भरा है, पुराने राज्य की योजनाओं का हक़ बना रहता है। दोनों जगह की योजनाओं में एक ही चीज़ का दोहरा पैसा नहीं मिलेगा, पर कार्ड बेकार भी नहीं होता।

कुछ राज्यों के बीच इस बारे में आपस में समझौते हुए हैं। यह आपके दोनों राज्यों पर लागू है या नहीं, यह हम पक्के तौर पर नहीं कह सकते — दोनों मंडलों की हेल्पलाइन पर पूछ लीजिए।

e-Shram कार्ड इस मामले में अलग है — वह पूरे देश का एक ही रजिस्टर है और राज्य बदलने से नहीं बदलता। इसीलिए दोनों बनवा लेना समझदारी है।

राशन: अपना राशन कार्ड "एक देश, एक राशन कार्ड" में जुड़ा हो तो नए शहर में भी उसी कार्ड पर राशन मिल जाता है। घर से निकलने से पहले यह पक्का कर लीजिए।

लेबर कार्ड और e-Shram कार्ड अलग-अलग हैं

बहुत लोग दोनों को एक समझ लेते हैं। e-Shram भारत सरकार का असंगठित मज़दूरों का रजिस्टर है, पूरे देश का एक।

e-Shram पर 16 से 59 साल का कोई भी असंगठित मज़दूर नाम लिखा सकता है। शर्त यह है कि आप EPFO या ESIC के सदस्य न हों और आयकर न भरते हों। इसके लिए आधार से जुड़ा मोबाइल नंबर चाहिए, रजिस्ट्रेशन मुफ़्त है, और हेल्पडेस्क 14434 या 1800-889-6811 पर रोज़ सुबह 9 से शाम 6 बजे तक बात होती है — रविवार को भी।

निर्माण मज़दूर के लिए राज्य का लेबर कार्ड ज़्यादा काम का है, क्योंकि पेंशन, शादी, इलाज और दुर्घटना वाली रकमें उसी से जुड़ी हैं। e-Shram मुख्य रूप से पहचान और रिकॉर्ड का काम करता है।

सबसे अच्छा यही है कि दोनों बनवा लें। दोनों मुफ़्त हैं और दोनों में कुछ भी खोने को नहीं है।

21 नवंबर 2025 के बाद क्या बदला

भारत की चार श्रम संहिताएँ (Labour Codes) 21 नवंबर 2025 से लागू हो गईं। इनसे 29 पुराने कानून एक साथ बदल गए, और निर्माण मज़दूरों वाला 1996 का कानून भी उन्हीं में है।

घबराने की बात नहीं है। सरकार ने ख़ुद कहा है कि बदलाव के इस दौर में पुराने कानूनों के नियम, अधिसूचनाएँ और योजनाएँ चलती रहेंगी। यानी आपका लेबर कार्ड, आपके मंडल की योजनाएँ और आपके दावे जैसे चल रहे थे वैसे ही चलेंगे।

नई संहिताओं में कुछ बातें मज़दूर के हक़ में साफ़ हुई हैं — हर मज़दूर को नियुक्ति पत्र (appointment letter) मिलना, हर मज़दूर के लिए न्यूनतम मज़दूरी का हक़, समय पर मज़दूरी, और 40 साल से ऊपर के मज़दूरों के लिए साल में एक मुफ़्त स्वास्थ्य जाँच।

राज्यों के अपने नए नियम अभी बन रहे हैं और अलग-अलग रफ़्तार से आ रहे हैं। इसलिए कोई भी दावा या शिकायत करने से पहले अपने राज्य की हेल्पलाइन पर एक बार पूछ लीजिए कि आज आपके मामले में कौन सा नियम लागू है।

कागज़ों की जाँच अब सख़्त हुई है

कई राज्यों की सरकारी लेखा परीक्षा में यह निकला कि निर्माण से बाहर के लोग भी मज़दूर बनकर रजिस्टर हो गए थे, और कई रोज़गार प्रमाणपत्रों में काम का ब्यौरा ही नहीं था।

इसका सीधा असर यह है कि अब कागज़ ज़्यादा ध्यान से जाँचे जाते हैं। असली मज़दूर के लिए यह अच्छी बात है, बशर्ते उसके कागज़ पूरे हों।

इसलिए दो काम कीजिए। एक — रोज़गार प्रमाणपत्र में काम का ब्यौरा और दिनों की गिनती साफ़ लिखवाइए, गोल-मोल मत छोड़िए। दो — अर्ज़ी ख़ुद दीजिए या सरकारी सेवा केंद्र पर जाइए, किसी बिचौलिये के हाथ मत दीजिए।

गड़बड़ कागज़ लगने पर नुक़सान आपका होगा, एजेंट का नहीं। और एक बार अर्ज़ी नामंज़ूर हो जाए तो दोबारा में महीनों लग जाते हैं।

ये काम जुड़े हैं

आम सवाल

लेबर कार्ड बनवाने में कितना पैसा लगता है?
यह राज्य पर निर्भर करता है। ज़्यादातर राज्यों में रजिस्ट्रेशन मुफ़्त है या नाम भर का पैसा लगता है, और ऊपर सालाना अंशदान की एक छोटी रकम होती है। कर्नाटक में अर्ज़ी की फ़ीस शून्य है। जो भी दें, रसीद ज़रूर लीजिए — एजेंट की वसूली सरकारी फ़ीस नहीं होती।
कार्ड बनवाने के लिए क्या शर्तें हैं?
उम्र 18 साल पूरी और 60 से कम, पिछले बारह महीनों में कम से कम 90 दिन निर्माण का काम, और काम निर्माण का होना चाहिए। ये तीन शर्तें केंद्र के कानून से आती हैं और हर राज्य में एक जैसी हैं।
मैं दूसरे राज्य से आया हूँ, कार्ड कहाँ बनेगा?
जिस राज्य में आप निर्माण का काम कर रहे हैं, उसी राज्य के मंडल में। कार्ड इस पर बनता है कि आप कहाँ काम कर रहे हैं, इस पर नहीं कि आपका घर कहाँ है। बिहार के हैं और दिल्ली में काम कर रहे हैं तो अर्ज़ी दिल्ली में जाएगी।
ठेकेदार प्रमाणपत्र देने से मना कर रहा है, अब क्या करूँ?
कई राज्यों में ठेकेदार के अलावा भी दस्तख़त करने वाले होते हैं — रजिस्टर्ड मज़दूर यूनियन, श्रम निरीक्षक या ग्राम पंचायत। कर्नाटक में तो चार अलग फ़ॉर्म ही बने हुए हैं। अपने मंडल की हेल्पलाइन पर यही सवाल पूछिए: ठेकेदार के अलावा और कौन दस्तख़त कर सकता है।
लेबर कार्ड और e-Shram कार्ड में क्या फ़र्क है?
e-Shram पूरे देश का एक रजिस्टर है, 16 से 59 साल के असंगठित मज़दूरों के लिए। लेबर कार्ड आपके राज्य के निर्माण कल्याण मंडल का है और पेंशन, इलाज, शादी, दुर्घटना जैसी रकमें उसी से मिलती हैं। दोनों मुफ़्त हैं, दोनों बनवा लीजिए।
कार्ड कितने दिन चलता है?
हर राज्य का नियम अलग है। ज़्यादातर जगह कार्ड की एक मियाद होती है और उसे रिन्यू कराना पड़ता है, वरना खाता बंद हो जाता है और बंद कार्ड पर कोई दावा नहीं होता। अपने राज्य के पन्ने पर रिन्यू की खिड़की देख लीजिए और फ़ोन में याद-दिलावा लगा लीजिए।
दूसरे राज्य चला जाऊँ तो पुराना कार्ड चलेगा?
अपने आप नहीं। नए राज्य में लंबे समय रुकना है तो वहाँ के मंडल में अलग रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है। पुराना कार्ड बंद मत कीजिए — मियाद चालू रहने तक उस राज्य की योजनाओं का हक़ बना रहता है। e-Shram कार्ड पूरे देश में एक ही रहता है।

शहर और राज्य के अनुसार

लेबर कार्ड, कल्याण बोर्ड और न्यूनतम मज़दूरी हर राज्य अलग तय करता है। अपने शहर पर जाएँ।

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स्रोत

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