निर्माण साइट पर सुरक्षा के नियम और मज़दूर के हक़
निर्माण का काम देश के सबसे ख़तरनाक कामों में है। ऊँचाई से गिरना, मिट्टी धँसना, बिजली का झटका और भारी सामान गिरना — ज़्यादातर मौतें इन्हीं से होती हैं। कानून ठेकेदार और मालिक पर साफ़ ज़िम्मेदारी डालता है कि वे साइट को सुरक्षित रखें। यह पन्ना बताता है कि आपका हक़ क्या है और हादसा हो जाए तो क्या करना है।
अपडेट:
कानून बदल चुका है — यह जानना ज़रूरी है
21 नवंबर 2025 से भारत की चार नई श्रम संहिताएँ लागू हो गई हैं। इनमें एक है व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 — छोटा नाम OSH संहिता।
इस संहिता ने तेरह पुराने केंद्रीय कानूनों की जगह ले ली है, और उनमें निर्माण मज़दूरों वाला पुराना BOCW कानून, 1996 भी है। यानी अब मुख्य कानून OSH संहिता है।
पर पुराने नियम एकदम ख़त्म नहीं हुए। बदलाव के दौर में पुराने कानूनों के तहत बने नियम, अधिसूचनाएँ और योजनाएँ तब तक चलती रहती हैं जब तक वे नई संहिता के ख़िलाफ़ न हों। साइट की बारीक सुरक्षा के नियम — जैसे स्कैफ़ोल्डिंग, सेफ्टी बेल्ट और जाली — आज भी उन्हीं पुराने नियमों से आते हैं।
राज्यों के अपने नए नियम अलग-अलग रफ़्तार से बन रहे हैं — कई राज्यों में वे अभी मसौदे (draft) में ही हैं। इसलिए किसी भी शिकायत या दावे से पहले अपने राज्य के श्रम विभाग की हेल्पलाइन पर पूछ लीजिए कि आपके मामले में आज कौन सा नियम लागू है।
साइट पर ठेकेदार को क्या-क्या देना होता है
सुरक्षा का सामान: हेलमेट, ऊँचाई पर काम के लिए सेफ्टी बेल्ट या हार्नेस, गीले काम के लिए वॉटरप्रूफ़ जूते, दस्ताने, और वेल्डिंग-कटाई-घिसाई के काम में आँखों का बचाव।
साइट का इंतज़ाम: जहाँ से गिरने का ख़तरा हो वहाँ रेलिंग और टो-बोर्ड, नीचे गिरने से बचाने के लिए जाली, मज़बूत और ठीक से बँधी स्कैफ़ोल्डिंग और कामकाजी प्लेटफ़ॉर्म, और खुदाई के किनारों को धँसने से रोकने का इंतज़ाम।
बुनियादी सुविधाएँ: पीने का साफ़ पानी, शौचालय, हाथ धोने की जगह, छाँव और भरा हुआ फ़र्स्ट-एड बॉक्स जो काम के हर घंटे में पहुँच में हो। बिल्डिंग मज़दूरों के लिए रहने की अस्थायी जगह भी मालिक की ज़िम्मेदारी है।
शौचालय की गिनती भी नियम में है — हर 25 पुरुष और हर 15 महिला कर्मचारियों पर कम से कम एक अलग शौचालय, हर 15 पुरुषों पर एक यूरिनल, और दिव्यांग तथा ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के लिए अलग इंतज़ाम।
यह सारा सामान मज़दूर से पैसे लेकर नहीं दिया जाता। यह ठेकेदार या मालिक की ज़िम्मेदारी है।
बड़ी साइट पर और क्या ज़रूरी है
नई OSH संहिता में मज़दूरों की गिनती के हिसाब से कुछ चीज़ें ज़रूरी हो जाती हैं, और इनकी सीमाएँ पहले से कम कर दी गई हैं।
क्रेच: जहाँ पचास से ज़्यादा मज़दूर काम करते हों वहाँ छह साल से छोटे बच्चों के लिए क्रेच ज़रूरी है। ध्यान दीजिए — पहले यह सिर्फ़ महिला मज़दूरों की गिनती पर था, अब कुल मज़दूरों की गिनती पर है।
कैंटीन: सौ या उससे ज़्यादा मज़दूर हों तो कैंटीन ज़रूरी है, और इस गिनती में ठेके के मज़दूर भी शामिल हैं।
सुरक्षा अधिकारी: निर्माण के काम में ढाई सौ या ज़्यादा मज़दूर हों तो अलग सुरक्षा अधिकारी रखना ज़रूरी है। मज़दूरों की गिनती बढ़ने पर अधिकारी भी बढ़ते हैं।
पाँच सौ या ज़्यादा मज़दूर हों तो सुरक्षा समिति बनानी होती है, और एंबुलेंस रूम भी ज़रूरी हो जाता है।
ऊँचाई पर काम — सबसे बड़ा ख़तरा
निर्माण में सबसे ज़्यादा मौतें ऊँचाई से गिरने से होती हैं। शटरिंग, प्लास्टर, पेंटिंग और सरिया बाँधने का काम अकसर बिना किसी बचाव के ऊपर होता है।
यहाँ एक बात साफ़ कर देनी ज़रूरी है, क्योंकि इंटरनेट पर इसका उल्टा लिखा मिलता है। नियमों में कोई तय ऊँचाई — जैसे दो मीटर या तीन मीटर — नहीं लिखी है जिसके ऊपर बेल्ट ज़रूरी हो जाए।
नियम इससे सख़्त है। नियम कहता है कि जहाँ भी गिरने का ख़तरा हो, वहाँ मालिक को बचाव का इंतज़ाम करना है। हर मज़दूर को सेफ्टी बेल्ट और लाइफ़लाइन देनी है और यह देखना है कि वह उसे इस्तेमाल करे। और जहाँ सामान, औज़ार या आदमी गिरने की संभावना भी हो, वहाँ जाली लगानी है। यानी ख़तरा है तो बचाव ज़रूरी है, ऊँचाई चाहे जितनी हो।
व्यावहारिक बात: बेल्ट तभी बचाता है जब उसका हुक किसी मज़बूत चीज़ से बँधा हो। कमर पर बेल्ट बाँधकर हुक कहीं न लगाना कोई सुरक्षा नहीं है।
बाँस या लकड़ी की स्कैफ़ोल्डिंग पर चढ़ने से पहले हिलाकर देख लीजिए। ढीली बँधी स्कैफ़ोल्डिंग पर चढ़ने से मना करना आपका हक़ है।
हादसा हो जाए तो पहले क्या करें
एक: घायल को ख़तरे से हटाएँ, पर टूटी हड्डी या रीढ़ की चोट में बिना ज़रूरत हिलाएँ नहीं।
दो: फ़र्स्ट-एड दें और तुरंत अस्पताल पहुँचाएँ। एंबुलेंस के लिए 108 है।
तीन: ठेकेदार, फ़ोरमैन या सुपरवाइज़र को तुरंत बताएँ। यह ख़बर देना मज़दूर की ज़िम्मेदारी है और मुँह से भी दी जा सकती है। घायल ख़ुद न बता सके तो कोई और उसकी तरफ़ से बता सकता है।
चार: फ़ोटो और वीडियो लें — जहाँ हादसा हुआ वहाँ की हालत, और सुरक्षा का सामान मौजूद था या नहीं। बाद में साइट साफ़ कर दी जाती है और सबूत ग़ायब हो जाता है।
पाँच: अस्पताल का हर पर्चा, बिल और रिपोर्ट संभालकर रखें। मुआवज़े का पूरा दावा इन्हीं कागज़ों पर टिकता है।
मालिक को हादसे की रिपोर्ट देनी होती है
नई OSH संहिता के नियमों में यह और सख़्त हो गया है।
मौत हो जाने पर: मालिक को तुरंत फ़ॉर्म XI में सूचना देनी होती है — निरीक्षक को, ज़िला अधिकारी या उपमंडल अधिकारी को, इलाके के थाने को, और मरने वाले के परिवार या रिश्तेदारों को भी। परिवार को ख़बर देना अब कानूनी ज़िम्मेदारी है।
गंभीर चोट पर: अगर चोट की वजह से मज़दूर 48 घंटे या उससे ज़्यादा काम नहीं कर पाता, तो 48 घंटे पूरे होने के 12 घंटे के अंदर फ़ॉर्म XI में सूचना देनी होती है।
ख़तरनाक घटना पर: कोई ख़तरनाक घटना हो जाए — चाहे किसी को चोट लगी हो या नहीं — तो 12 घंटे के अंदर सूचना देनी होती है।
मौत के मामले में जाँच अधिकारी को सूचना मिलने के दो महीने के अंदर जाँच शुरू करनी होती है।
अगर आपको लगे कि हादसे को छिपाया जा रहा है या मामला रफ़ा-दफ़ा किया जा रहा है, तो अपने राज्य की श्रम हेल्पलाइन पर ख़ुद ख़बर कीजिए। रिपोर्ट न देना अपने आप में शिकायत की वजह है।
चोट या मौत पर पैसा कहाँ से मिलता है
तीन अलग रास्ते हो सकते हैं। कौन सा लगेगा, यह आपकी हालत पर निर्भर करता है।
एक — ESI: अगर आप ESI में हैं तो काम में लगी चोट पर मज़दूरी का 90% मिलता है, नौकरी के पहले दिन से, चाहे अंशदान कटा हो या नहीं। हमेशा की अपंगता पर 90% महीने-महीने और पूरी अपंगता में ज़िंदगी भर। मौत पर परिवार को 90% महीने-महीने। अंतिम संस्कार के लिए ₹15,000 अलग।
दो — सामाजिक सुरक्षा संहिता का मुआवज़ा: जो मज़दूर ESI में नहीं आते, उनके लिए यह रास्ता है। इसमें मौत पर मासिक मज़दूरी का 50% और हमेशा की पूरी अपंगता पर 60%, उम्र के हिसाब से तय एक गुणक से गुणा करके बनता है। सरकार अलग से कोई रकम अधिसूचित करे तो दोनों में जो ज़्यादा हो वह मिलता है। यह गुणक और अधिसूचित रकम बदलती रहती है, इसलिए अपने मामले की गिनती वकील या श्रम विभाग से करवाइए।
तीन — आपके राज्य का कल्याण मंडल: अगर आपका लेबर कार्ड बना है, तो काम की जगह पर हुई दुर्घटना से मौत होने पर नामिनी को एकमुश्त रकम मिलती है, और अपंगता पर अलग रकम। रकम हर राज्य में अलग है — मिसाल के तौर पर कर्नाटक में मौत पर ₹8 लाख (16 जुलाई 2025 या उसके बाद की दुर्घटनाओं पर) और दिल्ली में दुर्घटना से मौत पर ₹2 लाख। अपने राज्य के पन्ने पर अपनी रकम देखिए।
एक ज़रूरी चेतावनी: मंडलों की अपनी वेबसाइटों पर एक ही योजना की रकम कई जगह अलग-अलग लिखी मिलती है — कर्नाटक में दुर्घटना से मौत की रकम तीन जगह तीन तरह लिखी है। भरोसा हमेशा राजपत्र की अधिसूचना पर कीजिए, और दावा करने से पहले अपने मंडल की हेल्पलाइन पर पुष्टि कर लीजिए।
इनमें से कोई भी रास्ता तभी खुलता है जब कागज़ पूरे हों। इसीलिए लेबर कार्ड पहले से बनवा लेना इतना ज़रूरी है — हादसे के बाद बनवाने से काम नहीं चलता।
ख़तरे की ख़बर देना आपका कानूनी हक़ है
नई संहिता में मज़दूर को साफ़ हक़ मिला है। आप मालिक से अपनी सुरक्षा और सेहत से जुड़ी जानकारी माँग सकते हैं, और सुरक्षा के इंतज़ाम में कमी की शिकायत सीधे मालिक से या सुरक्षा समिति के ज़रिए कर सकते हैं। संतोष न हो तो निरीक्षक तक जा सकते हैं।
और अगर आपको लगे कि तुरंत गंभीर चोट या मौत का ख़तरा है, तो आप यह बात मालिक को भी बता सकते हैं और साथ ही निरीक्षक को भी। मालिक को उस पर तुरंत सुधार करना होता है और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट भेजनी होती है।
ईमानदारी से एक बात साफ़ कर दें: कानून आपको ख़तरे की ख़बर देने और उसे ठीक कराने का हक़ देता है। यह "काम छोड़कर चले जाओ, कुछ नहीं होगा" वाली छूट नहीं है। ख़तरा है या नहीं, इस पर आख़िरी फ़ैसला निरीक्षक का होता है।
इसलिए अकेले लड़ने के बजाय साथ के मज़दूरों के साथ बात रखिए, और साइट की हालत का फ़ोटो-वीडियो पहले ले लीजिए। बिना सबूत की शिकायत आगे नहीं बढ़ पाती।
शिकायत के रास्ते: अपने राज्य की श्रमिक हेल्पलाइन (नंबर श्रम विभाग की वेबसाइट के मुखपृष्ठ पर लिखा रहता है), अपने इलाके के श्रम निरीक्षक का दफ़्तर, और राज्य का शिकायत पोर्टल।
हर दिन की पाँच आदतें
हेलमेट सिर पर, पट्टी ठुड्डी के नीचे कसी हुई। ढीला हेलमेट गिरते वक़्त सिर से पहले उतर जाता है।
ऊँचाई पर चढ़ने से पहले बेल्ट का हुक किसी मज़बूत चीज़ पर लगाइए, और उतरने के बाद ही खोलिए।
बिजली के औज़ार का तार और प्लग देख लीजिए। कटा हुआ तार, नंगी जोड़ और गीले हाथ — तीनों साथ हों तो जान जाती है।
गड्ढे या खुदाई में उतरने से पहले किनारे देखिए। मिट्टी झर रही हो तो मत उतरिए, चाहे कितनी भी जल्दी हो।
पानी पीते रहिए और दोपहर की तेज़ धूप में छाँव लीजिए। गर्मी में चक्कर आना भी हादसे की वजह बनता है।
ये काम जुड़े हैं
- सरिया मिस्त्री दिहाड़ी नौकरियाँ किराए पर लें
- वेल्डर दिहाड़ी नौकरियाँ किराए पर लें
- शटरिंग दिहाड़ी नौकरियाँ किराए पर लें
- बिजली मिस्त्री दिहाड़ी नौकरियाँ किराए पर लें
आम सवाल
- कितनी ऊँचाई से ऊपर सेफ्टी बेल्ट ज़रूरी है?
- नियमों में कोई तय ऊँचाई नहीं लिखी है। नियम इससे सख़्त है — जहाँ भी गिरने का ख़तरा हो, वहाँ मालिक को बेल्ट और लाइफ़लाइन देनी है और उसका इस्तेमाल करवाना है। जो लोग दो या तीन मीटर की सीमा बताते हैं, वे गलत बताते हैं।
- हेलमेट और सेफ्टी बेल्ट का पैसा मज़दूरी से काटा जा सकता है?
- नहीं। सुरक्षा का सामान देना ठेकेदार या मालिक की ज़िम्मेदारी है और उसका ख़र्च मज़दूरी से नहीं कटता।
- हादसे की रिपोर्ट मालिक को कितने समय में देनी होती है?
- मौत होने पर तुरंत, फ़ॉर्म XI में, और थाने, ज़िला अधिकारी तथा परिवार को भी। चोट से 48 घंटे या ज़्यादा काम न कर पाने पर, 48 घंटे पूरे होने के 12 घंटे के अंदर। ख़तरनाक घटना पर 12 घंटे के अंदर।
- साइट पर चोट लगी और ठेकेदार कह रहा है ख़ुद इलाज करा लो — क्या करूँ?
- यह गलत है। फ़र्स्ट-एड, इलाज और अस्पताल तक पहुँचाने का इंतज़ाम मालिक की ज़िम्मेदारी है, और हादसे की रिपोर्ट भी उसे देनी है। अस्पताल के सारे कागज़ संभालिए, हादसे का फ़ोटो लीजिए और अपने राज्य की श्रम हेल्पलाइन पर बताइए।
- मेरा लेबर कार्ड नहीं है, हादसे में क्या मिलेगा?
- कल्याण मंडल की मदद सिर्फ़ रजिस्टर्ड मज़दूर को मिलती है। ESI में हैं तो वहाँ से मिलेगा, नहीं तो सामाजिक सुरक्षा संहिता के मुआवज़े का रास्ता बचता है। इसीलिए काम शुरू करते ही लेबर कार्ड बनवा लेना चाहिए।
- साइट पर पीने का पानी और शौचालय नहीं है — यह शिकायत की बात है?
- हाँ। पीने का साफ़ पानी, शौचालय, हाथ धोने की जगह, छाँव और फ़र्स्ट-एड बॉक्स — ये सब देना कानूनन ज़रूरी है, कोई एहसान नहीं। पचास से ज़्यादा मज़दूर हों तो बच्चों के लिए क्रेच भी।
शहर और राज्य के अनुसार
लेबर कार्ड, कल्याण बोर्ड और न्यूनतम मज़दूरी हर राज्य अलग तय करता है। अपने शहर पर जाएँ।
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स्रोत
- OSH संहिता 2020 — मूल कानून (सुरक्षा, सुविधाएँ, हादसे की सूचना, धारा 14)
- चार श्रम संहिताएँ 21 नवंबर 2025 से लागू (PIB)
- BOCW केंद्रीय नियम 1998 — सेफ्टी बेल्ट, जाली, स्कैफ़ोल्डिंग (आज भी लागू)
- सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 — मुआवज़े का हिसाब (धारा 76)
- ESIC — चोट पर मिलने वाला फ़ायदा
- मिसाल — कर्नाटक राजपत्र 16-07-2025, दुर्घटना मृत्यु ₹8 लाख
- कर्मिका सहायवाणी हेल्पलाइन — 155214 / WhatsApp 9845353214